Saturday, 17 October 2015

एक और पाकिस्तान की तैयारी

बेशक लहू में डुबो दो
कातिलो मेरे बदन को
देना होगा तुम्हें ही मगर,
कन्धा मेरे कफ़न को।

मातम आज मेरे घर है कल तुम्हारे घर होगा
हमें लड़ाने वाला न यहाँ है , न वहां होगा!!
वो रोटियां सेंक रहा है
हमारी बेवकूफी की,
सनक की!
क्या तुम्हें सपने में भी
चुनाव में
उसकी जीत की भनक थी?

पल भर में
तबाह कर दिया उसने
हमको, हमारे जज्बात को
बरसों के रिश्तों की गहरी गाँठ को
हम बर्बाद हुए वो आबाद हुआ
कभी मुजफ्फरनगर, कभी गोधरा
तो कभी जहांनाबाद हुआ। 

वो पनपता गया , हम उजड़ते गए ,
वो लड़ाता गया, हम लड़ते गए ;
चंद बरसों पीछे एक 
पाकिस्तान बनाया था उसने।
लगता है फिर से कुछ ऐसा ही 
इरादा किया है उसने!!