Sunday, 17 May 2020

जीवन क्षणिक है !

जीवन क्षणिक है !!!
अगले पल की किसी को कोई खबर नहीं 
फिर भी संघर्ष जारी है 
न जाने क्यों प्रकृति ने उत्थान और पतन के इस चक्रव्यूह मे 
हम सब को जकड़ रखा है ?
ये जानते हुए भी कि अनंत गगन का लेश मात्र हूं !!
'मंगल' को जीतने की चाह पाले हूं!!
और पते की बात सुनो .............
जीत भी रहा हूं प्रकृति को और ब्रह्मांड को भी!

.............'कौशल' के साथ बैठा ही था दो दिन पहले 
पेट मे गैस की शिकायत की थी उसने 
आज फोन किया तो ...................... 
बोला एड्मिट हूं और डायलिसिस पे हूं !!!!!!!!!!!!!!!
किडनी बदलनी होगी ..............
बदल गई तो..... जीवन है वर्ना ....
नदी के उस पार जाना होगा ...............
मंगल के भी आगे .......
अमंगल की ओर !!!!!!!!!

उसे साहसिक,आशावादी शब्दों मे समझाया 
प्रेरित किया, जीवन आशा को जीवंत किया 
हँसाया भी उसे ............गुदगुदाया भी .............
ज़िंदा रहने का भरोसा ही दिला दिया मैंने .............
पर फोन रखते ही ............
मेरी आंखों का रक्त पिघलने लगा 
अश्रु धार फूट पड़ी .............
मैं हत्प्रभ बढ़ा अपनी उसी अलमारी की ओर 
जहां मेरी ओल्ड मोंक की बॉटल रखी थी मैंने 
पत्नी से छिपाकर।

अभी शराब पी रहा हूं। 
कौशल कभी न पीता था । 
न्यू इयर या होली पर भी नहीं !
बड़ी ज़िद के बाद भी एक न सुनता था मेरी।
एक न सुनता है मेरी ............. 
मेरा अपना तो नहीं............., 
मेरा पड़ोसी ही था कौशल।
पर आज की खबर सुनकर मालूम हुआ कि 
मेरा अपना ही था कौशल। 

वो जब वापस आएगा तो ज़रूर पिलाऊँगा उसे 
दो बूंद ही सही .....अपने साथ 
और में भी पीऊँगा उस पुनर्जजीवित आशा के साथ 
......................इस अपने के साथ ।।
सुमंगल के साथ, नव मंगल के साथ।।


Saturday, 16 May 2020

तुम्हारी याद

मेरी यादों के सागर में तुम्हारी प्यास है बाकी!
कि मैंने प्रीत की पहली तुम्हीं संग डोर थी बांधी!
नहीं गम है कि ठुकराई हमेशा प्यार की पाती 
ये क्या कम है कि मेरे हाथ पे राखी नहीं बांधी!!

कैंपस के लॉन में हमने तुम्हें घंटों निहारा था हॉस्टल की छत से आधी रात में तुमको पुकारा था 
भले ही प्यार ना था तुमको हमसे एक जर्रा भी
 जरा सी तो खुशी होगी, कोई आशिक तुम्हारा था!!

तुम्हारे गम को वाइन से जरा डाइल्यूट करते थे
तुम्हारा नाम अपने खूँ से डेकोरेट करते थे
पता चलने पे अगले दिन, हमें फिर डांटती थी तुम 
तुम्ही से प्यार करते थे, तुम्ही को हेट करते थे

जो हो जाती कहीं शादी, तो तुम पीने नहीं देती। 
जो नखरे ना उठा पाता, तो तुम सोने नहीं देती। 
तुम्हारी किच-किचों से तो तुम्हारी याद है बेहतर..
तुम्हें मेरे पास रखती है, कभी खोने नहीं देती!!

कलाकार कमल

Wednesday, 29 April 2020

शादी के सपने पर लॉक डाउन का कुठाराघात!

 गोवर्धन  प्रसाद धरती के उन विरले आदमियों में से था, जिनकी दो-दो शादियां हुई हों पर टिकी एक भी न हो!  एक घरवाली को दिल्ली घुमाने ले गया तो वह किसी सरदार के साथ भाग गई और दूसरी मायके गई तो लौटकर ही न आई! तब से उसने कुछ भी काम कर धंधा करना छोड़ दिया और अपने बीपीएल कार्ड से आने वाले राशन के  सहारे अपने गांव के पुश्तैनी मकान ने ही गुजर बसर करने लगा। गांव के बुजुर्गों और दूसरे लोगों का बड़ा सम्मान करता था। वो लोग प्यार से उसे गजोधर कहा करते।  स्वभाव का सरल और समाज में उठने बैठने वाला आदमी था इसलिए गांव में आने-जाने वाले लोग आते जाते उसे सौ-पचास रूपए दे ही जाते।  इन पैसों से उसका बीड़ी तंबाकू का खर्चा चल जाता। इसके अलावा उसका कोई खर्चा ना था। इससे अधिक क्या कहा जाए कि टिक-टौक और फेसबुक के जमाने में भी वह मोबाइल से पूरी दूरी बनाए हुए था!

 वैसे तो दो बीवियों के भागने के बाद मर्द जात  बाहर मुंह ना दिखाए,  मगर गजोधर हिम्मत हारने  वालों में से न था। जब भी कोई सयाना या बुजुर्ग उसके पास अकेले बैठ जाता तो एक बार वो अपने दिल की बात कह ही देता, "चाचा क्या हुआ जो दोनों भाग गई! इनकी किस्मत में नहीं था सो चलीं गई। कोई किस्मत वाली आयेगी तो राज करेगी!" और जैसे ही चाचा के मुंह से निकलता "हां बेटा गोवर्धन बात तो तुम ठीक कह रहे हो!" तो गोवर्धन तुरंत चाचा का हाथ पकड़ लेता और कहता "अपने समधी से कहो ना चाचा कि अपने गांव में कोई अच्छा घर परिवार देखकर मेरे रिश्ते की बात चलाएं।"

दो-दो घरवालियां भाग जाना कोई मामूली बात न थी। एक आम आदमी के लिए तो दो शादी कर लेना एक सपना ही होता है। यह बात और है कि यह वो सपना है जिसे हर शादीशुदा आदमी देखता है। मगर पूरा किसी-किसी भाग्यशाली का ही हो पाता है! खेती किसानी और दूसरे काम-धाम में गजोधर का कुछ विशेष मन नहीं लगता था। इसीलिए उसकी पहली दोनों बीवियां भाग गईं। फिर भी उसका हौसला सलाम करने लायक था कि दो-दो बीवियों से हाथ धोने के बाद भी वो तीसरी का ख्याल बना रहा था।

 इस बार होली पर गांव के बाहर रहने वाले सभी लोग त्योहार मनाने के लिए गांव आ पहुंचे थे। इनमें से दिल्ली से पहुंचे हरिओम शरण भी एक थे। अपनी मेहनत के बल पर दिल्ली जैसे शहर में उन्होंने अच्छा कारोबार जोड़ रखा था। पूरे इलाके में उनके मददगार रवैये का डंका बजता था। होली की शाम को कच्ची शराब की दो पैग लगाकर इमोशनल हुआ गजोधर  हरि ओम जी के पास जा पहुंचा। जैसे ही उसने उनसे अपनी शादी की बात छेड़नी चाही वैसे ही हरिओम बोल पड़े "अरे गजोधर शादी तो तेरी मैं करवा दूंगा मगर इसके लिए दो पैसे खर्च भी तो करने पड़ेंगे। अब तेरे पिताजी तो रहे नहीं कि वह अपनी गाढ़ी कमाई में से तेरा ब्याह करवा दें। और फिर लड़की वालों को भी तो यह बताना पड़ेगा कि लड़का फलाँ जगह नौकरी करता है! तेरे निकम्मेपन के कारण पहले ही दो घरवालियाँ भाग चुकी हैं तो अब तो तुझे कुछ काम करना चाहिए। तू होली के बाद दिल्ली आजा! मैं तुझे कहीं अच्छे काम पर लगवा दूंगा।"

उनकी कड़क मिजाज और खरी-खरी बातें सुनकर गोवर्धन मन मसोसकर चला आया; मगर इस बार उसने  मन ही मन यह ठान ली कि चाहे जो भी करना पड़े मगर वह तीसरी शादी करेगा जरूर! दो पत्नियों से जुदा हुआ गजोधर तीसरी को पाने के लिए दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गया और यहां-वहां से टिकट का इंतजाम कर होली के आठवें रोज ही दिल्ली वाली बस में बैठ गया। टनकपुर से दिल्ली के पूरे रास्ते में उसे एक पल भी नींद ना आई। बंद आंखों से टुकूर-टुकूर अपनी नई दुल्हन के सपने संवारता रहा। सुबह-सुबह  चार बजे ही बस  दिल्ली पहुंच गई। गजोधर लोगों से पूछ-पूछ कर किसी तरह हरिओम शरण के घर के पते पर पहुंचा तो पता चला कि वह अपने व्यापार के काम से कहीं बाहर गए हुए हैं, हफ्ते भर बाद लौटेंगे। उनकी पत्नी और बच्चों ने उसे पहचानने से तो इनकार कर ही दिया साथ ही बैरंग वापस भी लौटा दिया।

बेचारा गजोधर सिर पर हाथ रख कर वहीं सड़क पर बैठ गया। उसके बंडल की आखिरी बीड़ी भी अब अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी। उसे फूंक कर वह पास के एक ढाबे में  जा पहुंचा। बात करने पर ढाबे का मालिक उसे काम पर रखने के लिए तैयार हो गया। मगर उसकी हालत देखकर उसने उसे बर्तन धोने का ही काम दिया। गजोधर समझ चुका था कि  बगैर पैसे के  अब न तो धमनी चलेंगी और नहीं धौंकनी! भूखे प्यासे गजोधर ने बर्तन धोने का काम भी मंजूर कर लिया। पहले दो रोटी खाई और फिर काम पर लग गया। रात को बारह बजे ढाबा बंद होने के बाद वह जमीन पर ही सो गया। उसने सोच लिया कि हफ्ते भर बाद हरि ओम शरण लौट आएंगे तो फिर जाकर उनसे बात करेगा। तब तक ढाबे पर ही काम करेगा। पर यहां तो तकदीर ने कुछ और ही मुकर्रर कर रखा था।  अगले दिन रात के आठ बजे अचानक जनता कर्फ्यू लग गया! जनता कर्फ्यू के तीसरे दिन लॉक डाउन हो गया। मालिक का ढाबा बंद हो गया तो उसने दूसरे नौकरों की तरह गजोधर को भी काम से निकाल दिया। अब गजोधर के पास न तो छत रही, ना जेब में रुपया-टका और ना ही कुछ खाने-पीने को! बेचारा सपने बुनने आया राजधानी में और राजधानी में ही रात हो गई! अब करे तो क्या करे?

ढाबे में काम करने वाले एक लड़के ने कहा कि पैदल ही गाँव चले चलते हैं तो गजोधर ने तुरंत कमर में गमछा बांध लिया और बोला चलो भैया बहुत हो गया! अपनी तीसरी शादी के सपने को दांतो से पीसता हुआ, मुंह में गमछा बांधकर  पैदल  ही चल दिया अपने गांव की ओर!  अभी कोई चार कोस चला होगा कि पुलिसवालों के हाथ लग गया और वो उसे एक फ्लाईओवर के नीचे यह कह कर बैठा गए कि यहां से हिलना मत! जिस लड़के के साथ गांव जाने के लिए निकला था वह भाग निकला। बेचारा गजोधर अब अकेला ही रह गया। उसे दिल्ली के रास्तों का भी कोई अता-पता नहीं। यहां तक कि उसे यह भी मालूम नहीं था कि वह दिल्ली में किस जगह पर है। फ्लाईओवर के नीचे लोग तो कई बैठे थे मगर वह किसी को नहीं जानता था। खो चुका था वह इस सपनों के शहर में! अब उसे अपना गांव याद आ रहा था  जहां वह अकेला होने के बावजूद भी अकेला नहीं था।

इधर हरिओम शरण जब वापस आए तो उन्हें गांव के प्रधान स्वरूप चंद का फोन आ गया। बातों ही बातों में जब उन्होंने गजोधर के बारे में पूछा तो स्वरूप चंद  ने बताया कि वह तो  होली के आठवें रोज ही  दिल्ली के लिए रवाना हो गया था। पूरा गांव यह मान कर बैठा हुआ था कि वह उनके ही पास है! हरिओम शरण के तो जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई! उन्होंने जब अपनी पत्नी से डांट-झिड़ककर पूछा तो उन्हें पूरी बात पता चली।  पर बेचारे करते तो क्या करते! लॉक डाउन के कारण कहीं तलाश भी नहीं कर सकते! बेचारे सिर पर हाथ रख कर बैठ गए। 

महीना बीत गया मगर किसी को गजोधर की कोई खबर नहीं। इधर गाँव में किसी ने यह अफवाह उड़ा दी कि दिल्ली में गजोधर को उसकी पहली बीवी मिल गई और आजकल वह  उसी के साथ रह रहा है। मगर हकीकत यह है कि कोई भी नहीं जानता कि गजोधर है कहाँ?  बेचारा बीवी की तलाश में दिल्ली गया था, मगर लॉक डाउन में वह खुद ही खो गया। इधर हरिओम शरण इंतजार कर रहे हैं कि कब लॉक डाउन खत्म हो और कब गजोधर की कुछ खोजबीन की जाय; उधर प्रवासी मजदूरों की भीड़ में बैठा गजोधर दो वक्त के खाने के लिए भीड़ के साथ भीड़ से संघर्ष कर रहा है।  यही नहीं, दिन में सूरज की आग और रात में मच्छरों के जहरीले डंक से बचने के लिए चुपचाप किसी कोने में सिकुड़ रहा है। कोरोना के बारे में वह अभी तक कुछ नहीं जान पाया है, इसलिए साबुन और सैनिटाइजर से उसका कोई वास्ता ही नहीं!


 मशाल man

Sunday, 1 December 2019

अभिमान है मुझे कि तुम मेरी घरवाली हो!

तुम्हारे प्यार में आज भी उतना ही पागल हूँ, 
जितना बरसों पहले तुमसे मिलने के बाद हो गया था। 
खो गया था तुम्हारी आंखों में,
शायद उसी दिन तुम्हारा हो गया था।

तुम मेरे जीवन का वो उजाला हो जो अंधेरी रात में 
जुगनू की तरह मुझे जिंदगी का रास्ता दिखा रहा है। 
तुम वो प्रेरणा हो 
जिससे मेरे जीने की इच्छा को ईंधन मिल रहा है।
सच कहूं तो मेरी मंजिल भी तुम, मेरा रास्ता भी तुम हो, 
मेरी चॉकलेट भी तुम और मेरा पास्ता भी तुम हो। 

मेरे नीरस जीवन में रस भरने वाली 
वो रसभरी भी हो तुम। 
तुम वर्षा रितु की वो पहली फुहार हो..
जो तपती धरती को थाह देती है। 
सूरज की वो पहली किरण भी हो तुम.. 
जो रात के घने अंधेरे को चुटकी में हर लेती है। 

मैं तुलसीदास तो नहीं कि तुम्हारे प्रेम में 
रामचरितमानस रच दूँ!
पर मेरे दिल की किताब का हर पन्ना,
तुम्हारे एहसानों की अमिट-गाथा है।

तुम्हारे बिना जीवन कुछ भी तो न था..
एक सूखा उपवन ही था।
इस बगिया की हरियाली हो तुम.. 
इस जीवन वृक्ष की अनमिट प्यास हो तुम.. 
सच कहूँ तो जिंदगी का खुशनुमा एहसास हो तुम।

तुम ही हो मेरी गौरी, तुम ही मेरी काली हो!
नि:शस्त्र हो कर भी परम शक्तिशाली हो,
तुम ही हो सर्वकामप्रदायिनी.. मेरी आराध्या!
अभिमान है मुझे कि तुम मेरी घरवाली हो।।



Saturday, 30 November 2019

असम दर्शन

अकेला बैठा हूं कमरे में. वहां गांव में तो बच्चे आसमान सिर में उठाए रहते थे. न जागने देते थे और न ही सोने! और कहां यहां वीरान सुनसान अकेला कमरे में पड़ा हुआ हूं. कभी छत की ओर देखकर उसमें भारत का नक्शा बनाकर उसमें अपने गांव को ढूंढने लगता हूं तो कभी खामोश दीवारों की ओर देखकर उनसे ही सवाल पूछने की कोशिश करता हूं. खिड़की खोलकर बाहर की ओर देखने पर बस हरियाली हरियाली ही नजर आती है. पांच बजे शाम तक चारों ओर घुप्प अंधेरा छा जाता है, न सड़कों पर कोई दिखाई देता है और ना ही रास्तों पर. 

इस वक्त मैं असम के जोरहाट नामक स्थान पर एक सरकारी कैंप के भीतर मौजूद हूं. यह जगह उत्तर भारत से काफी जु़दा है, चाहे भाषा बोली के मामले में हो, जलवायु के मामले में हो या फिर खानपान के मामले में ही क्यों ना हो. वहां ग्वालियर में जब चालीस रुपए किलो टमाटर था, तो हम मोल भाव करके उसे तीस में लाने की कोशिश करते थे और यहां आकर टमाटर का भाव पूछा तो साठ रुपए किलो था. दूध का स्वाद ऐसा था जैसे पाउडर घोलकर पानी में मिला दिया गया हो. गुवाहाटी से जोरहाट तक मैं ट्रेन से आया मगर पूरे रास्ते में कहीं एक अदद भैंस तक नहीं दिखाई दी. 

सब्जियां बेहिसाब महंगी हैं. यहां तक कि आटा भी कोई चालीस पचास रुपये किलो मिल रहा है. एक दुकानदार ने बताया कि यहां कोई रोटी नहीं खाता इसलिए यहां गेहूं नहीं मिलता और आटा भी बेहद महंगे दामों पर मिलता है. उत्सुकता वश मैं भी पूछ बैठा कि भाई यहां यह तो बताओ यहां मिलता क्या है तो वह बोला कि यहां सस्ता और बढ़िया अगर कुछ मिलता है तो वह है मछली! 

मछली का नाम सुनते ही मेरे दिमाग में पानी की छवि तैरने लगी. बाथरूम में आने वाले पानी का रंग लाल हरा पीला मिलाके थोड़ा सा जंग के रंग का है. स्वाद बड़ा अजीब सा है. पहले तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वाकई पानी है. जो लोग ग्वालियर और दिल्ली के पानी को खारा कहते हैं वह इस पानी को शायद पानी मानने से ही इंकार कर दें कर दें! दीवारों में हर जगह सीलन है, कई जगह तो काई जमी हुई है और यह केवल घरों के बाहर ही नहीं बल्कि भीतर की दीवारों में भी जमी हुई है. सुना है कि यह सांपो की बड़ी पसंदीदा जगह है, चलते-फिरते कभी दरवाजों से तो कभी छत से यहां सांप कुछ उस तरह गिरते रहते हैं जैसे चौमांस के महीने में पीपल का फल! 

मिट्टी कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाई देती. या तो बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है या फिर पेड़ों के समूह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. कहीं-कहीं केरल की तरह नारियल के भी पेड़ हैं. सोचता हूं कि चलो कम से कम नारियल पानी तो सस्ता होगा. दरअसल मैं थोड़ा कंजूस किसिम का आदमी हूं इसलिए किसी जगह का आकलन सबसे पहले मैं उसके बाजार भाव से ही करता हूं. इसके बाद से दूसरी चीजों को देखता हूं. 

दुकानों में पुरुष हो चाहे स्त्रियां बोलते बिल्कुल एक ही सा हैं: करती है खाती है पीती है आती है जाती है यही बोलते हैं. भाषा में लिंग के अंतर के लिए यहां कोई जगह नहीं है. भाषा की क्लिष्टता को यहां के लोगों ने कुछ हद तक काफी कम कर दिया है. हिंदी लोग समझ भी लेते हैं और बोल भी लेते हैं, वह बात अलग है कि जी उसके आभूषणों को उतार देते हैं। यानी कि हमको भी समझा भी देते ही हैं. भाषा का यही उद्देश्य है कि आप खुद समझ लें और सामने वाले को समझा लें, बाकी सुंदरता और शुद्धता के दावे तो भाषा के कथित ठेकेदारों के बीच वाद-विवाद की चीजें होती हैं. आम जन का इससे कोई लेना-देना नहीं होता.

जो भी हो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य मैं तो बिल्कुल भी कमी नहीं है चारों ओर सुंदरता भरी पड़ी है. बारिश बेइंतहा होती है और रुक भी जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे अभी हो ही रही हो, शायद पूर्वोत्तर की तस्वीर में चेरापूंजी और मानसून की बंगाल की खाड़ी वाली शाखा से होने वाली ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन वर्षा  जेहन में स्थाई रुप से अंकित हो चुकी है. पिछले तीन चार दिनों से बारिश हो रही थी जो कि कल ही बंद हुई है मगर तारीफ करनी होगी यहां के ड्रेनेज सिस्टम की, कि कहीं पर दो लोटा पानी भी इकट्ठा हुआ नजर नहीं आता, वरना अपने यहां तो घंटे भर की बारिश में शहर के सारे छोटे-बड़े गड्ढे भर जाते हैं बल्कि कभी-कभी तो सड़कों को देखकर लिए लगने लगता है कि शायद या बाढ़ ही आ गई हो! जबकि हकीकत यह होती है कि महज घंटा दो घंटा बारिश, मुश्किल से हुई होती है. ड्रेनेज सिस्टम के मामले में यहां से काफी कुछ सीखा जा सकता है. मैस में जाने पर एक नई चीज देखने को मिली कि टेबल पर हरी मिर्च जरुरी तौर पर परोसी जाती है. खाने में लहसुन खूब डाला जाता है और अक्सर देखता हूं कि वह कच्चा ही रहता है और उसकी महक पूरे खाने को गुलजार करती है कह लीजिए या फिर बर्बाद करती है, मैं नहीं बता पाऊंगा. यहां तक कि समोसे, परांठे और आलू की सब्जी वगैरा में भी कच्चा लहसुन अलग से महक रहा होता है. 

आप भी कभी असम आइये और इस सबका मजा लीजिए। काजीरंगा के हाथी, कामाख्या मंदिर पर लगी भीड़ देखने जरूर जाइएगा और यहां का मशहूर तांबूल और यहां की लाल चाय जरूर टेस्ट कीजिएगा।

'विमलापन': एक आजन्म अभिशाप


नारायण दत्त रिटायर्ड फौजी थे। घर में एक बूढ़ी मां, तीन बेटियां और एक बेटा था। इसके अलावा छोटे भाई के परिवार का भी ख्याल रखना ही पड़ता था। बड़ा परिवार था इसलिए रिटायर होने के बाद ट्रक चलाने लगे। पत्नी खेती का कार्यभार संभाले हुए थे। खेती-बाड़ी  पशुपालन  और उनकी नौकरी के बल पर घर ठीक-ठाक चल रहा था।

उनकी बड़ी बेटी का नाम था विमला। बहुत लाड़ था उनको उससे। बचपन से ही उन्होंने बड़े नाज से पाला था उसे। सभी बच्चों में विशेष लगाव था उन्हें विमला से। वक्त की गति को कौन  जानता है! सभी बेटियों की तरह विमला भी विवाह के योग्य हो गई। वर की खोज होने लगी। कन्या रूपमती तो थी ही, कामकाज में कुशल होने के कारण किसी को कोई विशेष चिंता ना थी।

एक दिन पंडितजी जी दूर गांव से एक रिश्ता लेकर पहुंचे। नारायण तो अभी उसे बच्ची ही समझते थे मगर पत्नी जिद करते हुए कहने लगी "इसके पीछे और भी दो बेटियां ब्याहनी हैं। इसलिए समय से शादी कर देना ठीक है। यूं भी तो लड़कियों का विवाह समय पर हो जाना ही बिरादरी में ठीक माना जाता है। कल को कोई ऐसी वैसी बात हो जाए तो मुंह दिखाना मुश्किल हो जायेगा।"

पत्नी की जिद के आगे भला पति की भला कब चली है। होते-होते लड़के वाले ही आ पहुंचे देखने के लिए। नापसंद करने जैसा कुछ भी ना था। शादी का दिन भी तय हो गया। शादी की तैयारियां होने लगी। मंगल गीत गाए जाने लगे। घर में पुताई होने लगी। सजावट के ठान बान किए जाने लगे। फाइनली फागुन मास की चौदस को बारात द्वारे पर आ गई।

शिवप्रसाद एक युवा और आकर्षक व्यक्तित्व वाला हट्टा-कट्टा नौजवान था। हाथ में कुल्हाड़ी दे दी जाए तो एक चोट में देवदार के तने के दो टुकड़े कर दे। दूल्हे का सेहरा पहने तो वह और ही लाजवाब दिखता था। पारंपरिक पहाड़ी रीति रीति-रिवाज के साथ विवाह संस्कार संपन्न हुआ और विमला चल पड़ी अपनी ससुराल की ओर। नारायण दत्त ने भीगी पलकों के साथ बेटी की डोली को कंधा दिया और बारात विदा हुई।

नए घर में सास बहू की शुरुआती तकरार के बाद कुछ ही दिनों में विमला सबकी लाडली हो गई। जेठानिया और सास-ससुर सब उसके गुण गाते न थकते थे। इसी बीच नारायण दत्त को उनके समधी की चिट्ठी मिली है कि गोद भराई के लिए चले आएं। नारायण दत्त की खुशी का ठिकाना ना रहा। फलों की टोकरी, मिठाइयां और तरह-तरह के शगुन लेकर वो बेटी की ससुराल जा पहुंचे।

विमला ने जुड़वा बेटों को जन्म दिया। सास-ससुर की तो मानो बांछें खिल गई। सपनों की सेज सजाई जाने लगी।  कई-कई लंगोटे  सिलवाई गई।  मिठाईयां मंगाई गई।  ससुर जी ने पालने भी दो-दो मंगवा लिए। घर में किलकारियां आ गई। अभी कोई पाँच दिन ना हुए होंगे कि अचानक दोनों बच्चों की तबीयत बिगड़ी और बारह घंटे के अंतर पर एक के बाद एक दोनों काल के गाल में समा गए। घर की खुशियां मातम में बदल गईं। विमला की झोली आंसुओं से भर गई।

मातम में कौन कितना साथ देता है। हर किसी को  काम चाहिए था। विमला ने भी कमर कसी और दोनो पति-पत्नी निकल पड़े खेतों में पसीना बहाने। कुछ ही दिनों में जिंदगी फिर से पुरानी जैसी हो गई। इसी बीच  खेतों में काम करते हुए एक दिन शिवप्रसाद की छाती में तेज दर्द हुआ, खांसी आई और खून की एकाध उल्टी हुई। अस्पताल पहुंचाया तो उन्होंने भर्ती कर लिया। डॉक्टरों ने कहा कि हालत गंभीर है कुछ जांच करवानी होंगी।

जांच की रिपोर्ट अपने साथ नाउम्मीदगी लेकर आई। डॉक्टर से पता चला डॉक्टर से पता चला कि शिवप्रसाद चंद घंटों का मेहमान था। विमला के दामन में दुख और दर्द का पहाड़ टूट पड़ा। भर्ती होने के तीसरे रोज शिव प्रसाद ने अस्पताल में ही तोड़ दिया। विमला का सिंदूर वैधव्य की भेंट चढ़ गया। हाय री  कुदरत तेरा इंसाफ! पहले मां से उसके बच्चे छीन लिए और उसके बाद एक सुहागन से उसका सौभाग्य!

महज उन्नीस बरस की विधवा बेटी जब गांव लौटी तो नारायण दत्त फूट फूट कर रो पड़े। वह इस कदर टूट गए कि उन्होंने गाड़ी चलानी छोड़ दी और घर पर ही रहने लगे। उनकी तबीयत भी अब कुछ ठीक नहीं रहा करती। दुख की वेदना इंसान की रातों की नींद उड़ा देती है। एक दुखियारा बाप भाग्य को कोसने के सिवा कर भी क्या सकता था?

 जब वह लंबे समय तक काम पर वापस नहीं लौटे तो उनका एक पुराना साथी ड्राइवर छत्र सिंह उनसे मिलने गांव ही पहुंच गया।  उसने पूछा "नारायण दा तू क्यों परेशान है?" परेशानी जानने पर उसने कहा "अगर तू बुरा ना माने तो मैं लड़का बताता हूं। लड़का रोजगार वाला है मगर उसके मां-बाप नहीं हैं। बिटिया को संभाल लेगा। तेरी बेटी की अभी उम्र ही क्या है? तू इसकी दूसरी शादी कर दे। फिर से इसका घर बस जाएगा और तेरा दुख दूर हो जाएगा।" 

नारायण दत्त की आंखों में खुशी की चमक आ गई। उन्होंने अपनी पत्नी को खेतों से वापस बुलाया और खुशी-खुशी छतर सिंह का प्रस्ताव सुना डाला। पत्नी आग बबूला हो गई बोली ब्राह्मणों में औरतों का दूसरा विवाह उसकी मृत्यु से भी बुरा माना जाता है। दोबारा इस तरह की बात मत करना। हमारे धर्म में औरतें पति के साथ सती होती हैं और तुम हो कि अपनी बेटी का दूसरा विवाह कराने पर तुले हुए हो। समाज में मुंह दिखाने लायक छोड़ोगे कि नहीं" 

दूसरे कमरे में बैठी  विमला यह सबकुछ सुन रही थी। कुछ देर उम्मीदों के उथले समंदर में गोते लगाने के बाद अब वह वापस सामने टंगी हुई अपनी फटी हुई सफेद चुनरी को एकटक देख रही थी। वह अब अपनी रंगहीन नियति को बखूबी जान चुकी थी।




महादेव बाबा का स्वाभिमान


महादेव बाबा कभी स्कूल नहीं गए। कभी टूथपेस्ट से दांत साफ नहीं किए और ना कभी कोई दातुन की। एक पुराना कोट पहनते थे जिसे कि साल दो साल में एक बार धो लेते होंगे। मगर नहाते रोज थे और धोती पहनते थे टांगों के बीच से लपेटा लगाकर। वो काले रंग की गांधी टोपी और वह हर रोज मोटा और भारी होता जा रहा वो काले रंग का कोट, उनकी कुछ खास पहचान थे। गांव के बच्चे और बड़े सभी उन्हें प्यार से महादेव बूबू कहा करते थे।

काले पत्थरों की ढालदार छत पर बैठकर कभी गेहूं सुखाते तो कभी चावल। उसी छत पर बैठकर सर्दियों के लिए पुरानी फटी हुई धोती, पैंट, कमीज को सील सील कर रजाई गद्दे बनाया करते थे। वहीं आंगन में बच्चे लोग क्रिकेट खेलते थे। अगर बच्चों की बॉल उनकी छत पर चली गई तो समझ लो कि वहीं उन पर भूमिया अवतार हो जाता था। फिर तो खूब गाली गलौज करते थे।

हमारे गांव की इकलौती दुकान के दुकानदार हुआ करते थे वो! यह दुकान कोई शोरूम या गोदाम नहीं था बल्कि एक आठ खानों वाली लकड़ी की एक अलमारी थी, जिसके अंदर टॉफी, बिस्किट, नमकीन, चाय पत्ती, चीनी, बीड़ी सिगरेट, तंबाकू, साबुन, तेल, नमक जैसी रोजमर्रा की जरूरत का सामान मिल जाया करता। दुकान सुबह नौ बजे से पहले, दोपहर लंच टाइम पर और फिर इसके बाद सीधे शाम को खुलती थी जब वह खेतों से घर पर लौट आते थे।

महादेव जोशी नाम था उनका। वैसे तो धर्म कर्म वाले आदमी थे, गांव के गणमान्य डंगरिया भी थे। किसी को भी डर लगे, छल लगे या भूत वूत लग जाए तो झाड़-फूंक करने और भभुति लगाने में एक्सपर्ट थे। लेकिन होली दिवाली पर कच्ची पक्की जो मिल जाए चढ़ा लिया  करते थे। ज्यादा राग द्वेष, लड़ाई- झगड़ा किसी से ना था। सीधे सिंपल आदमी, न उधो का लेना न माधो का देना।

पर शरीफ आदमियों की चलने कहां दी है किसी ने! स्कूल तो कभी गए नहीं थे, जोड़ घटाने में कुछ खास तेज भी नहीं थे। बस शौक था एक दुकानदार कहलाने का तो दुकान खोल रखी थी। गांव के कुछ धूर्तों ने उनसे सामान लेकर उन्हें पैसे नहीं चुकाए और उधार करते रहे। ज्यादा बड़ा जोड़ महादेव बूबू कर नहीं पाते थे। बेचारे ठगे गए। शहर के बड़े लाला का पैसा नहीं चुका पाए। जब पैसा नहीं चुका पाए तो आगे सामान मिलना बंद हो गया और फाइनली उनकी दुकान ठप हो गई। नुकसान तो गांव वालों का भी हुआ मगर महादेव बूबू का तो रोजगार ही चला गया!

गांव से शहर की दूरी ग्यारह किलोमीटर थी, उसमें भी दो ढाई किलोमीटर का खड़ा पैदल रास्ता। अब लोगों को छोटे से छोटा सामान लेने के लिए शहर जाना पड़ता, जहां दुकानदार उनसे मन मांगे पैसे ऐंठ लिया करते थे। सबको महादेव बूबू की दुकान याद आने लगी थी। अब गांव वालों को महसूस हो रहा था कि उनकी उस दुकान की क्या वैल्यू थी। छोटे बच्चे लोग भी वहां से खूब बलून, पतंग, बिस्किट और टॉफिया खरीदा करते थे। दुकान के बहाने शाम को गांव के लोगों की एक चौपाल ही हो जाया करती थी, मगर जब से दुकान बंद हो गई तो उठना बैठना भी बंद हो गया। अब सब सुनसान था।

उधर महादेव बूबू यह सोच कर परेशान थे कि लाला का कर्ज कैसे चुकाया जाए। लाला कर्जा वापस मांगने के लिए सर पर चढ़ने लगा तो महादेव बूबू को काफी चिंता होने लगी। उम्र 70 के पार हो चुकी थी। बूढ़ी हड्डियों में इतनी ताकत भी नहीं थी कि  कहीं मजदूरी करके चार पैसे कमा लें। हार कर उन्होंने अपने बेटे छोरीलाल से कहा कि वह स्कूल छोड़ कर काम करने शहर चला जाए और कुछ पैसे कमा ले। छोरी लाल को बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ा और वह दिल्ली चला गया। वहां उसे होटल में वेटर की नौकरी मिल गई। कोई साल भर नौकरी करने के बाद वह बड़ी मुश्किल से लाला के पैसे चुका पाया। 

इस पूरे साल महादेव बूबू ने केवल एक टाइम खाना खाया। उन्होंने प्रण कर रखा था कि जब तक लाला का कर्ज न चुका देंगे तब तक एक वक्त भोजन करेंगे वहां  बाल नहीं काटेंगे। लाला का कर्जा चुकाने के बाद उन्होंने घाट में रामगंगा नदी में स्नान किया और मुंडन  करवाया। इसके बाद रामेश्वर में शिवजी को जल चढ़ाया। गांवके  मंदिर जाकर सभी देवी देवताओं को गंगाजल से अभिषेक कराया। उसके बाद बोलेंगी  कि अब चैन से मर सकूंगा, गंगा स्नान के चौथे दिन उनकी इहलोक लीला समाप्त हो गई। यह होती है ईमानदारी और स्वाभिमान की आग जो इंसान को मरने भी नहीं देती!