Wednesday, 29 April 2020

शादी के सपने पर लॉक डाउन का कुठाराघात!

 गोवर्धन  प्रसाद धरती के उन विरले आदमियों में से था, जिनकी दो-दो शादियां हुई हों पर टिकी एक भी न हो!  एक घरवाली को दिल्ली घुमाने ले गया तो वह किसी सरदार के साथ भाग गई और दूसरी मायके गई तो लौटकर ही न आई! तब से उसने कुछ भी काम कर धंधा करना छोड़ दिया और अपने बीपीएल कार्ड से आने वाले राशन के  सहारे अपने गांव के पुश्तैनी मकान ने ही गुजर बसर करने लगा। गांव के बुजुर्गों और दूसरे लोगों का बड़ा सम्मान करता था। वो लोग प्यार से उसे गजोधर कहा करते।  स्वभाव का सरल और समाज में उठने बैठने वाला आदमी था इसलिए गांव में आने-जाने वाले लोग आते जाते उसे सौ-पचास रूपए दे ही जाते।  इन पैसों से उसका बीड़ी तंबाकू का खर्चा चल जाता। इसके अलावा उसका कोई खर्चा ना था। इससे अधिक क्या कहा जाए कि टिक-टौक और फेसबुक के जमाने में भी वह मोबाइल से पूरी दूरी बनाए हुए था!

 वैसे तो दो बीवियों के भागने के बाद मर्द जात  बाहर मुंह ना दिखाए,  मगर गजोधर हिम्मत हारने  वालों में से न था। जब भी कोई सयाना या बुजुर्ग उसके पास अकेले बैठ जाता तो एक बार वो अपने दिल की बात कह ही देता, "चाचा क्या हुआ जो दोनों भाग गई! इनकी किस्मत में नहीं था सो चलीं गई। कोई किस्मत वाली आयेगी तो राज करेगी!" और जैसे ही चाचा के मुंह से निकलता "हां बेटा गोवर्धन बात तो तुम ठीक कह रहे हो!" तो गोवर्धन तुरंत चाचा का हाथ पकड़ लेता और कहता "अपने समधी से कहो ना चाचा कि अपने गांव में कोई अच्छा घर परिवार देखकर मेरे रिश्ते की बात चलाएं।"

दो-दो घरवालियां भाग जाना कोई मामूली बात न थी। एक आम आदमी के लिए तो दो शादी कर लेना एक सपना ही होता है। यह बात और है कि यह वो सपना है जिसे हर शादीशुदा आदमी देखता है। मगर पूरा किसी-किसी भाग्यशाली का ही हो पाता है! खेती किसानी और दूसरे काम-धाम में गजोधर का कुछ विशेष मन नहीं लगता था। इसीलिए उसकी पहली दोनों बीवियां भाग गईं। फिर भी उसका हौसला सलाम करने लायक था कि दो-दो बीवियों से हाथ धोने के बाद भी वो तीसरी का ख्याल बना रहा था।

 इस बार होली पर गांव के बाहर रहने वाले सभी लोग त्योहार मनाने के लिए गांव आ पहुंचे थे। इनमें से दिल्ली से पहुंचे हरिओम शरण भी एक थे। अपनी मेहनत के बल पर दिल्ली जैसे शहर में उन्होंने अच्छा कारोबार जोड़ रखा था। पूरे इलाके में उनके मददगार रवैये का डंका बजता था। होली की शाम को कच्ची शराब की दो पैग लगाकर इमोशनल हुआ गजोधर  हरि ओम जी के पास जा पहुंचा। जैसे ही उसने उनसे अपनी शादी की बात छेड़नी चाही वैसे ही हरिओम बोल पड़े "अरे गजोधर शादी तो तेरी मैं करवा दूंगा मगर इसके लिए दो पैसे खर्च भी तो करने पड़ेंगे। अब तेरे पिताजी तो रहे नहीं कि वह अपनी गाढ़ी कमाई में से तेरा ब्याह करवा दें। और फिर लड़की वालों को भी तो यह बताना पड़ेगा कि लड़का फलाँ जगह नौकरी करता है! तेरे निकम्मेपन के कारण पहले ही दो घरवालियाँ भाग चुकी हैं तो अब तो तुझे कुछ काम करना चाहिए। तू होली के बाद दिल्ली आजा! मैं तुझे कहीं अच्छे काम पर लगवा दूंगा।"

उनकी कड़क मिजाज और खरी-खरी बातें सुनकर गोवर्धन मन मसोसकर चला आया; मगर इस बार उसने  मन ही मन यह ठान ली कि चाहे जो भी करना पड़े मगर वह तीसरी शादी करेगा जरूर! दो पत्नियों से जुदा हुआ गजोधर तीसरी को पाने के लिए दिल्ली जाने के लिए तैयार हो गया और यहां-वहां से टिकट का इंतजाम कर होली के आठवें रोज ही दिल्ली वाली बस में बैठ गया। टनकपुर से दिल्ली के पूरे रास्ते में उसे एक पल भी नींद ना आई। बंद आंखों से टुकूर-टुकूर अपनी नई दुल्हन के सपने संवारता रहा। सुबह-सुबह  चार बजे ही बस  दिल्ली पहुंच गई। गजोधर लोगों से पूछ-पूछ कर किसी तरह हरिओम शरण के घर के पते पर पहुंचा तो पता चला कि वह अपने व्यापार के काम से कहीं बाहर गए हुए हैं, हफ्ते भर बाद लौटेंगे। उनकी पत्नी और बच्चों ने उसे पहचानने से तो इनकार कर ही दिया साथ ही बैरंग वापस भी लौटा दिया।

बेचारा गजोधर सिर पर हाथ रख कर वहीं सड़क पर बैठ गया। उसके बंडल की आखिरी बीड़ी भी अब अपनी आखिरी सांसें गिन रही थी। उसे फूंक कर वह पास के एक ढाबे में  जा पहुंचा। बात करने पर ढाबे का मालिक उसे काम पर रखने के लिए तैयार हो गया। मगर उसकी हालत देखकर उसने उसे बर्तन धोने का ही काम दिया। गजोधर समझ चुका था कि  बगैर पैसे के  अब न तो धमनी चलेंगी और नहीं धौंकनी! भूखे प्यासे गजोधर ने बर्तन धोने का काम भी मंजूर कर लिया। पहले दो रोटी खाई और फिर काम पर लग गया। रात को बारह बजे ढाबा बंद होने के बाद वह जमीन पर ही सो गया। उसने सोच लिया कि हफ्ते भर बाद हरि ओम शरण लौट आएंगे तो फिर जाकर उनसे बात करेगा। तब तक ढाबे पर ही काम करेगा। पर यहां तो तकदीर ने कुछ और ही मुकर्रर कर रखा था।  अगले दिन रात के आठ बजे अचानक जनता कर्फ्यू लग गया! जनता कर्फ्यू के तीसरे दिन लॉक डाउन हो गया। मालिक का ढाबा बंद हो गया तो उसने दूसरे नौकरों की तरह गजोधर को भी काम से निकाल दिया। अब गजोधर के पास न तो छत रही, ना जेब में रुपया-टका और ना ही कुछ खाने-पीने को! बेचारा सपने बुनने आया राजधानी में और राजधानी में ही रात हो गई! अब करे तो क्या करे?

ढाबे में काम करने वाले एक लड़के ने कहा कि पैदल ही गाँव चले चलते हैं तो गजोधर ने तुरंत कमर में गमछा बांध लिया और बोला चलो भैया बहुत हो गया! अपनी तीसरी शादी के सपने को दांतो से पीसता हुआ, मुंह में गमछा बांधकर  पैदल  ही चल दिया अपने गांव की ओर!  अभी कोई चार कोस चला होगा कि पुलिसवालों के हाथ लग गया और वो उसे एक फ्लाईओवर के नीचे यह कह कर बैठा गए कि यहां से हिलना मत! जिस लड़के के साथ गांव जाने के लिए निकला था वह भाग निकला। बेचारा गजोधर अब अकेला ही रह गया। उसे दिल्ली के रास्तों का भी कोई अता-पता नहीं। यहां तक कि उसे यह भी मालूम नहीं था कि वह दिल्ली में किस जगह पर है। फ्लाईओवर के नीचे लोग तो कई बैठे थे मगर वह किसी को नहीं जानता था। खो चुका था वह इस सपनों के शहर में! अब उसे अपना गांव याद आ रहा था  जहां वह अकेला होने के बावजूद भी अकेला नहीं था।

इधर हरिओम शरण जब वापस आए तो उन्हें गांव के प्रधान स्वरूप चंद का फोन आ गया। बातों ही बातों में जब उन्होंने गजोधर के बारे में पूछा तो स्वरूप चंद  ने बताया कि वह तो  होली के आठवें रोज ही  दिल्ली के लिए रवाना हो गया था। पूरा गांव यह मान कर बैठा हुआ था कि वह उनके ही पास है! हरिओम शरण के तो जैसे पैरों तले जमीन खिसक गई! उन्होंने जब अपनी पत्नी से डांट-झिड़ककर पूछा तो उन्हें पूरी बात पता चली।  पर बेचारे करते तो क्या करते! लॉक डाउन के कारण कहीं तलाश भी नहीं कर सकते! बेचारे सिर पर हाथ रख कर बैठ गए। 

महीना बीत गया मगर किसी को गजोधर की कोई खबर नहीं। इधर गाँव में किसी ने यह अफवाह उड़ा दी कि दिल्ली में गजोधर को उसकी पहली बीवी मिल गई और आजकल वह  उसी के साथ रह रहा है। मगर हकीकत यह है कि कोई भी नहीं जानता कि गजोधर है कहाँ?  बेचारा बीवी की तलाश में दिल्ली गया था, मगर लॉक डाउन में वह खुद ही खो गया। इधर हरिओम शरण इंतजार कर रहे हैं कि कब लॉक डाउन खत्म हो और कब गजोधर की कुछ खोजबीन की जाय; उधर प्रवासी मजदूरों की भीड़ में बैठा गजोधर दो वक्त के खाने के लिए भीड़ के साथ भीड़ से संघर्ष कर रहा है।  यही नहीं, दिन में सूरज की आग और रात में मच्छरों के जहरीले डंक से बचने के लिए चुपचाप किसी कोने में सिकुड़ रहा है। कोरोना के बारे में वह अभी तक कुछ नहीं जान पाया है, इसलिए साबुन और सैनिटाइजर से उसका कोई वास्ता ही नहीं!


 मशाल man