Saturday, 30 November 2019

असम दर्शन

अकेला बैठा हूं कमरे में. वहां गांव में तो बच्चे आसमान सिर में उठाए रहते थे. न जागने देते थे और न ही सोने! और कहां यहां वीरान सुनसान अकेला कमरे में पड़ा हुआ हूं. कभी छत की ओर देखकर उसमें भारत का नक्शा बनाकर उसमें अपने गांव को ढूंढने लगता हूं तो कभी खामोश दीवारों की ओर देखकर उनसे ही सवाल पूछने की कोशिश करता हूं. खिड़की खोलकर बाहर की ओर देखने पर बस हरियाली हरियाली ही नजर आती है. पांच बजे शाम तक चारों ओर घुप्प अंधेरा छा जाता है, न सड़कों पर कोई दिखाई देता है और ना ही रास्तों पर. 

इस वक्त मैं असम के जोरहाट नामक स्थान पर एक सरकारी कैंप के भीतर मौजूद हूं. यह जगह उत्तर भारत से काफी जु़दा है, चाहे भाषा बोली के मामले में हो, जलवायु के मामले में हो या फिर खानपान के मामले में ही क्यों ना हो. वहां ग्वालियर में जब चालीस रुपए किलो टमाटर था, तो हम मोल भाव करके उसे तीस में लाने की कोशिश करते थे और यहां आकर टमाटर का भाव पूछा तो साठ रुपए किलो था. दूध का स्वाद ऐसा था जैसे पाउडर घोलकर पानी में मिला दिया गया हो. गुवाहाटी से जोरहाट तक मैं ट्रेन से आया मगर पूरे रास्ते में कहीं एक अदद भैंस तक नहीं दिखाई दी. 

सब्जियां बेहिसाब महंगी हैं. यहां तक कि आटा भी कोई चालीस पचास रुपये किलो मिल रहा है. एक दुकानदार ने बताया कि यहां कोई रोटी नहीं खाता इसलिए यहां गेहूं नहीं मिलता और आटा भी बेहद महंगे दामों पर मिलता है. उत्सुकता वश मैं भी पूछ बैठा कि भाई यहां यह तो बताओ यहां मिलता क्या है तो वह बोला कि यहां सस्ता और बढ़िया अगर कुछ मिलता है तो वह है मछली! 

मछली का नाम सुनते ही मेरे दिमाग में पानी की छवि तैरने लगी. बाथरूम में आने वाले पानी का रंग लाल हरा पीला मिलाके थोड़ा सा जंग के रंग का है. स्वाद बड़ा अजीब सा है. पहले तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वाकई पानी है. जो लोग ग्वालियर और दिल्ली के पानी को खारा कहते हैं वह इस पानी को शायद पानी मानने से ही इंकार कर दें कर दें! दीवारों में हर जगह सीलन है, कई जगह तो काई जमी हुई है और यह केवल घरों के बाहर ही नहीं बल्कि भीतर की दीवारों में भी जमी हुई है. सुना है कि यह सांपो की बड़ी पसंदीदा जगह है, चलते-फिरते कभी दरवाजों से तो कभी छत से यहां सांप कुछ उस तरह गिरते रहते हैं जैसे चौमांस के महीने में पीपल का फल! 

मिट्टी कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाई देती. या तो बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है या फिर पेड़ों के समूह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. कहीं-कहीं केरल की तरह नारियल के भी पेड़ हैं. सोचता हूं कि चलो कम से कम नारियल पानी तो सस्ता होगा. दरअसल मैं थोड़ा कंजूस किसिम का आदमी हूं इसलिए किसी जगह का आकलन सबसे पहले मैं उसके बाजार भाव से ही करता हूं. इसके बाद से दूसरी चीजों को देखता हूं. 

दुकानों में पुरुष हो चाहे स्त्रियां बोलते बिल्कुल एक ही सा हैं: करती है खाती है पीती है आती है जाती है यही बोलते हैं. भाषा में लिंग के अंतर के लिए यहां कोई जगह नहीं है. भाषा की क्लिष्टता को यहां के लोगों ने कुछ हद तक काफी कम कर दिया है. हिंदी लोग समझ भी लेते हैं और बोल भी लेते हैं, वह बात अलग है कि जी उसके आभूषणों को उतार देते हैं। यानी कि हमको भी समझा भी देते ही हैं. भाषा का यही उद्देश्य है कि आप खुद समझ लें और सामने वाले को समझा लें, बाकी सुंदरता और शुद्धता के दावे तो भाषा के कथित ठेकेदारों के बीच वाद-विवाद की चीजें होती हैं. आम जन का इससे कोई लेना-देना नहीं होता.

जो भी हो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य मैं तो बिल्कुल भी कमी नहीं है चारों ओर सुंदरता भरी पड़ी है. बारिश बेइंतहा होती है और रुक भी जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे अभी हो ही रही हो, शायद पूर्वोत्तर की तस्वीर में चेरापूंजी और मानसून की बंगाल की खाड़ी वाली शाखा से होने वाली ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन वर्षा  जेहन में स्थाई रुप से अंकित हो चुकी है. पिछले तीन चार दिनों से बारिश हो रही थी जो कि कल ही बंद हुई है मगर तारीफ करनी होगी यहां के ड्रेनेज सिस्टम की, कि कहीं पर दो लोटा पानी भी इकट्ठा हुआ नजर नहीं आता, वरना अपने यहां तो घंटे भर की बारिश में शहर के सारे छोटे-बड़े गड्ढे भर जाते हैं बल्कि कभी-कभी तो सड़कों को देखकर लिए लगने लगता है कि शायद या बाढ़ ही आ गई हो! जबकि हकीकत यह होती है कि महज घंटा दो घंटा बारिश, मुश्किल से हुई होती है. ड्रेनेज सिस्टम के मामले में यहां से काफी कुछ सीखा जा सकता है. मैस में जाने पर एक नई चीज देखने को मिली कि टेबल पर हरी मिर्च जरुरी तौर पर परोसी जाती है. खाने में लहसुन खूब डाला जाता है और अक्सर देखता हूं कि वह कच्चा ही रहता है और उसकी महक पूरे खाने को गुलजार करती है कह लीजिए या फिर बर्बाद करती है, मैं नहीं बता पाऊंगा. यहां तक कि समोसे, परांठे और आलू की सब्जी वगैरा में भी कच्चा लहसुन अलग से महक रहा होता है. 

आप भी कभी असम आइये और इस सबका मजा लीजिए। काजीरंगा के हाथी, कामाख्या मंदिर पर लगी भीड़ देखने जरूर जाइएगा और यहां का मशहूर तांबूल और यहां की लाल चाय जरूर टेस्ट कीजिएगा।

'विमलापन': एक आजन्म अभिशाप


नारायण दत्त रिटायर्ड फौजी थे। घर में एक बूढ़ी मां, तीन बेटियां और एक बेटा था। इसके अलावा छोटे भाई के परिवार का भी ख्याल रखना ही पड़ता था। बड़ा परिवार था इसलिए रिटायर होने के बाद ट्रक चलाने लगे। पत्नी खेती का कार्यभार संभाले हुए थे। खेती-बाड़ी  पशुपालन  और उनकी नौकरी के बल पर घर ठीक-ठाक चल रहा था।

उनकी बड़ी बेटी का नाम था विमला। बहुत लाड़ था उनको उससे। बचपन से ही उन्होंने बड़े नाज से पाला था उसे। सभी बच्चों में विशेष लगाव था उन्हें विमला से। वक्त की गति को कौन  जानता है! सभी बेटियों की तरह विमला भी विवाह के योग्य हो गई। वर की खोज होने लगी। कन्या रूपमती तो थी ही, कामकाज में कुशल होने के कारण किसी को कोई विशेष चिंता ना थी।

एक दिन पंडितजी जी दूर गांव से एक रिश्ता लेकर पहुंचे। नारायण तो अभी उसे बच्ची ही समझते थे मगर पत्नी जिद करते हुए कहने लगी "इसके पीछे और भी दो बेटियां ब्याहनी हैं। इसलिए समय से शादी कर देना ठीक है। यूं भी तो लड़कियों का विवाह समय पर हो जाना ही बिरादरी में ठीक माना जाता है। कल को कोई ऐसी वैसी बात हो जाए तो मुंह दिखाना मुश्किल हो जायेगा।"

पत्नी की जिद के आगे भला पति की भला कब चली है। होते-होते लड़के वाले ही आ पहुंचे देखने के लिए। नापसंद करने जैसा कुछ भी ना था। शादी का दिन भी तय हो गया। शादी की तैयारियां होने लगी। मंगल गीत गाए जाने लगे। घर में पुताई होने लगी। सजावट के ठान बान किए जाने लगे। फाइनली फागुन मास की चौदस को बारात द्वारे पर आ गई।

शिवप्रसाद एक युवा और आकर्षक व्यक्तित्व वाला हट्टा-कट्टा नौजवान था। हाथ में कुल्हाड़ी दे दी जाए तो एक चोट में देवदार के तने के दो टुकड़े कर दे। दूल्हे का सेहरा पहने तो वह और ही लाजवाब दिखता था। पारंपरिक पहाड़ी रीति रीति-रिवाज के साथ विवाह संस्कार संपन्न हुआ और विमला चल पड़ी अपनी ससुराल की ओर। नारायण दत्त ने भीगी पलकों के साथ बेटी की डोली को कंधा दिया और बारात विदा हुई।

नए घर में सास बहू की शुरुआती तकरार के बाद कुछ ही दिनों में विमला सबकी लाडली हो गई। जेठानिया और सास-ससुर सब उसके गुण गाते न थकते थे। इसी बीच नारायण दत्त को उनके समधी की चिट्ठी मिली है कि गोद भराई के लिए चले आएं। नारायण दत्त की खुशी का ठिकाना ना रहा। फलों की टोकरी, मिठाइयां और तरह-तरह के शगुन लेकर वो बेटी की ससुराल जा पहुंचे।

विमला ने जुड़वा बेटों को जन्म दिया। सास-ससुर की तो मानो बांछें खिल गई। सपनों की सेज सजाई जाने लगी।  कई-कई लंगोटे  सिलवाई गई।  मिठाईयां मंगाई गई।  ससुर जी ने पालने भी दो-दो मंगवा लिए। घर में किलकारियां आ गई। अभी कोई पाँच दिन ना हुए होंगे कि अचानक दोनों बच्चों की तबीयत बिगड़ी और बारह घंटे के अंतर पर एक के बाद एक दोनों काल के गाल में समा गए। घर की खुशियां मातम में बदल गईं। विमला की झोली आंसुओं से भर गई।

मातम में कौन कितना साथ देता है। हर किसी को  काम चाहिए था। विमला ने भी कमर कसी और दोनो पति-पत्नी निकल पड़े खेतों में पसीना बहाने। कुछ ही दिनों में जिंदगी फिर से पुरानी जैसी हो गई। इसी बीच  खेतों में काम करते हुए एक दिन शिवप्रसाद की छाती में तेज दर्द हुआ, खांसी आई और खून की एकाध उल्टी हुई। अस्पताल पहुंचाया तो उन्होंने भर्ती कर लिया। डॉक्टरों ने कहा कि हालत गंभीर है कुछ जांच करवानी होंगी।

जांच की रिपोर्ट अपने साथ नाउम्मीदगी लेकर आई। डॉक्टर से पता चला डॉक्टर से पता चला कि शिवप्रसाद चंद घंटों का मेहमान था। विमला के दामन में दुख और दर्द का पहाड़ टूट पड़ा। भर्ती होने के तीसरे रोज शिव प्रसाद ने अस्पताल में ही तोड़ दिया। विमला का सिंदूर वैधव्य की भेंट चढ़ गया। हाय री  कुदरत तेरा इंसाफ! पहले मां से उसके बच्चे छीन लिए और उसके बाद एक सुहागन से उसका सौभाग्य!

महज उन्नीस बरस की विधवा बेटी जब गांव लौटी तो नारायण दत्त फूट फूट कर रो पड़े। वह इस कदर टूट गए कि उन्होंने गाड़ी चलानी छोड़ दी और घर पर ही रहने लगे। उनकी तबीयत भी अब कुछ ठीक नहीं रहा करती। दुख की वेदना इंसान की रातों की नींद उड़ा देती है। एक दुखियारा बाप भाग्य को कोसने के सिवा कर भी क्या सकता था?

 जब वह लंबे समय तक काम पर वापस नहीं लौटे तो उनका एक पुराना साथी ड्राइवर छत्र सिंह उनसे मिलने गांव ही पहुंच गया।  उसने पूछा "नारायण दा तू क्यों परेशान है?" परेशानी जानने पर उसने कहा "अगर तू बुरा ना माने तो मैं लड़का बताता हूं। लड़का रोजगार वाला है मगर उसके मां-बाप नहीं हैं। बिटिया को संभाल लेगा। तेरी बेटी की अभी उम्र ही क्या है? तू इसकी दूसरी शादी कर दे। फिर से इसका घर बस जाएगा और तेरा दुख दूर हो जाएगा।" 

नारायण दत्त की आंखों में खुशी की चमक आ गई। उन्होंने अपनी पत्नी को खेतों से वापस बुलाया और खुशी-खुशी छतर सिंह का प्रस्ताव सुना डाला। पत्नी आग बबूला हो गई बोली ब्राह्मणों में औरतों का दूसरा विवाह उसकी मृत्यु से भी बुरा माना जाता है। दोबारा इस तरह की बात मत करना। हमारे धर्म में औरतें पति के साथ सती होती हैं और तुम हो कि अपनी बेटी का दूसरा विवाह कराने पर तुले हुए हो। समाज में मुंह दिखाने लायक छोड़ोगे कि नहीं" 

दूसरे कमरे में बैठी  विमला यह सबकुछ सुन रही थी। कुछ देर उम्मीदों के उथले समंदर में गोते लगाने के बाद अब वह वापस सामने टंगी हुई अपनी फटी हुई सफेद चुनरी को एकटक देख रही थी। वह अब अपनी रंगहीन नियति को बखूबी जान चुकी थी।




महादेव बाबा का स्वाभिमान


महादेव बाबा कभी स्कूल नहीं गए। कभी टूथपेस्ट से दांत साफ नहीं किए और ना कभी कोई दातुन की। एक पुराना कोट पहनते थे जिसे कि साल दो साल में एक बार धो लेते होंगे। मगर नहाते रोज थे और धोती पहनते थे टांगों के बीच से लपेटा लगाकर। वो काले रंग की गांधी टोपी और वह हर रोज मोटा और भारी होता जा रहा वो काले रंग का कोट, उनकी कुछ खास पहचान थे। गांव के बच्चे और बड़े सभी उन्हें प्यार से महादेव बूबू कहा करते थे।

काले पत्थरों की ढालदार छत पर बैठकर कभी गेहूं सुखाते तो कभी चावल। उसी छत पर बैठकर सर्दियों के लिए पुरानी फटी हुई धोती, पैंट, कमीज को सील सील कर रजाई गद्दे बनाया करते थे। वहीं आंगन में बच्चे लोग क्रिकेट खेलते थे। अगर बच्चों की बॉल उनकी छत पर चली गई तो समझ लो कि वहीं उन पर भूमिया अवतार हो जाता था। फिर तो खूब गाली गलौज करते थे।

हमारे गांव की इकलौती दुकान के दुकानदार हुआ करते थे वो! यह दुकान कोई शोरूम या गोदाम नहीं था बल्कि एक आठ खानों वाली लकड़ी की एक अलमारी थी, जिसके अंदर टॉफी, बिस्किट, नमकीन, चाय पत्ती, चीनी, बीड़ी सिगरेट, तंबाकू, साबुन, तेल, नमक जैसी रोजमर्रा की जरूरत का सामान मिल जाया करता। दुकान सुबह नौ बजे से पहले, दोपहर लंच टाइम पर और फिर इसके बाद सीधे शाम को खुलती थी जब वह खेतों से घर पर लौट आते थे।

महादेव जोशी नाम था उनका। वैसे तो धर्म कर्म वाले आदमी थे, गांव के गणमान्य डंगरिया भी थे। किसी को भी डर लगे, छल लगे या भूत वूत लग जाए तो झाड़-फूंक करने और भभुति लगाने में एक्सपर्ट थे। लेकिन होली दिवाली पर कच्ची पक्की जो मिल जाए चढ़ा लिया  करते थे। ज्यादा राग द्वेष, लड़ाई- झगड़ा किसी से ना था। सीधे सिंपल आदमी, न उधो का लेना न माधो का देना।

पर शरीफ आदमियों की चलने कहां दी है किसी ने! स्कूल तो कभी गए नहीं थे, जोड़ घटाने में कुछ खास तेज भी नहीं थे। बस शौक था एक दुकानदार कहलाने का तो दुकान खोल रखी थी। गांव के कुछ धूर्तों ने उनसे सामान लेकर उन्हें पैसे नहीं चुकाए और उधार करते रहे। ज्यादा बड़ा जोड़ महादेव बूबू कर नहीं पाते थे। बेचारे ठगे गए। शहर के बड़े लाला का पैसा नहीं चुका पाए। जब पैसा नहीं चुका पाए तो आगे सामान मिलना बंद हो गया और फाइनली उनकी दुकान ठप हो गई। नुकसान तो गांव वालों का भी हुआ मगर महादेव बूबू का तो रोजगार ही चला गया!

गांव से शहर की दूरी ग्यारह किलोमीटर थी, उसमें भी दो ढाई किलोमीटर का खड़ा पैदल रास्ता। अब लोगों को छोटे से छोटा सामान लेने के लिए शहर जाना पड़ता, जहां दुकानदार उनसे मन मांगे पैसे ऐंठ लिया करते थे। सबको महादेव बूबू की दुकान याद आने लगी थी। अब गांव वालों को महसूस हो रहा था कि उनकी उस दुकान की क्या वैल्यू थी। छोटे बच्चे लोग भी वहां से खूब बलून, पतंग, बिस्किट और टॉफिया खरीदा करते थे। दुकान के बहाने शाम को गांव के लोगों की एक चौपाल ही हो जाया करती थी, मगर जब से दुकान बंद हो गई तो उठना बैठना भी बंद हो गया। अब सब सुनसान था।

उधर महादेव बूबू यह सोच कर परेशान थे कि लाला का कर्ज कैसे चुकाया जाए। लाला कर्जा वापस मांगने के लिए सर पर चढ़ने लगा तो महादेव बूबू को काफी चिंता होने लगी। उम्र 70 के पार हो चुकी थी। बूढ़ी हड्डियों में इतनी ताकत भी नहीं थी कि  कहीं मजदूरी करके चार पैसे कमा लें। हार कर उन्होंने अपने बेटे छोरीलाल से कहा कि वह स्कूल छोड़ कर काम करने शहर चला जाए और कुछ पैसे कमा ले। छोरी लाल को बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ा और वह दिल्ली चला गया। वहां उसे होटल में वेटर की नौकरी मिल गई। कोई साल भर नौकरी करने के बाद वह बड़ी मुश्किल से लाला के पैसे चुका पाया। 

इस पूरे साल महादेव बूबू ने केवल एक टाइम खाना खाया। उन्होंने प्रण कर रखा था कि जब तक लाला का कर्ज न चुका देंगे तब तक एक वक्त भोजन करेंगे वहां  बाल नहीं काटेंगे। लाला का कर्जा चुकाने के बाद उन्होंने घाट में रामगंगा नदी में स्नान किया और मुंडन  करवाया। इसके बाद रामेश्वर में शिवजी को जल चढ़ाया। गांवके  मंदिर जाकर सभी देवी देवताओं को गंगाजल से अभिषेक कराया। उसके बाद बोलेंगी  कि अब चैन से मर सकूंगा, गंगा स्नान के चौथे दिन उनकी इहलोक लीला समाप्त हो गई। यह होती है ईमानदारी और स्वाभिमान की आग जो इंसान को मरने भी नहीं देती!



हर गांव की लाइफ लाइन: गोपुली आमा

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में चंपावत जिले में एक छोटा सा गांव है मल्ली ग्विनाड़ा। वर्षों पहले यहां एक बड़ी जिंदादिल महिला रहती थी, नाम था गोपी देवी! प्यार से पूरा गांव उसे गोपुली आमा कहकर बुलाता था। गांव का कोई भी मौका हो, कोई पर्व हो, कोई त्यौहार हो, दुख की बेला हो या फिर शादी-बारात; कुछ ही क्यों ना हो! गोपुली आमा बिना गांव में पत्ता नहीं हिलता था। औरतों की बैठक हो, बच्चों की ठिठोली हो या फिर बड़े बुजुर्गों की पंचायत, गोपुली आमा हर महफिल की जरूरत होती थी। शादी की रतेली हो, होली की बैठक हो या फिर भजन संध्या ही क्यों ना हो; गोपुली आमा इन सब की रौनक थी। देवता के जागर और पूजा-पाठ आदि के मामलों में तो मानो डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त थी उसको!

शादी, पूजा-पाठ, जागर आदि कार्यक्रमों में गोपुली आमा मंगल-गीत गाया करती थी। खूब इज्जत और मान्यता थी गांव में उसकी। इसके अलावा किसी घर में कोई दुख-तकलीफ हो तो सबसे पहले पहुंचने वाली शख्स हुआ करती थी। गंगनाथ की डंगरिया थी, तो कभी झाड़ना-फूूंकना, भभूति लगाना, जहां जैसी जरूरत हो वहां उसी रूप में हाजिर होने वाली सुलभ और सहज इंसान थी वो। दुख में संवेदना, सुख में दिल खोलकर मदद और वह सदाबहार खिलखिलाती मुस्कुराहट उसके अनोखे आभूषण थे। जब हंसती थी तो थमने का नाम ही ना लेती थी। 'खीं-खी' करते वह आधे घिसे काले दांत, आज भी मुझे याद आते हैं तो आंखें नम हो जाती हैं। उसके बिना हमारा गांव ऐसा था, मानो बिना मेट्रो के दिल्ली एनसीआर ! 

खूब मेहनत करने वाली कठोर परिश्रमी महिला थी वह।  रोज अपनी गाय के लिए दूर-दूर के खेतों से घास काटकर  सिर पर उठा कर लाया करती। कभी कबार ही चप्पल पहन कर चलती होगी वरना आंगन में नंगे पैर भागती हुई मिलती थी।  इसी का नतीजा था कि फटी एड़ियों के बीच इतनी चौड़ी दरारें बन चुकी थी कि उनमें सौ-सौ के नोट फोल्ड करके रख दो तो फिट आ जाएं।  एक बार मैंने कहा इसमें कुछ क्रीम लगा कर ठीक कर ले, तो बोली "ना-ना-ना इन खुरदरे तलवों से रात में पैर खुजाने में बहुत अच्छा लगता है!" ऐसी ही निराली बातें तो पूरे गांव की चहेती बनाए हुए थी उसको!

 पूरा गांव उसके साथ था मगर इतनौं  के साथ रहने के बाद भी अपने घर में गोपुली आमा अकेली थी। उसकी एक गाय और एक बछड़ा, यही साथी थे उसके। एक बेटा था जो दूर शहर में बीवी-बच्चों के साथ रहता था। वहीं का हो गया। सास-बहू की भला कब बनी है, यहां भी कहानी कुछ ऐसी ही थी। हां, बेटे से महीने का खर्चा बराबर आता था। उसी से  गोपुली आमा का गुड़-मिश्री का खर्चा चलता था। जो घर चला जाता, चाय पिलाए बगैर उसे वापस न आने देती थी।

 एक और मुसाफिर था जो गाहे-बगाहे, महीने दो महीने में उससे मिलने आ ही जाता था, नाम था मथुरा। और कोई नहीं यह गोपुली आमा का छोटा भाई था। दिमाग से बिल्कुल पैदल और कर्म से एकदम निठल्ला। यहां आता तो बैठकर खाता। पूरा गांव उसे मथुरा मामा कहकर बुलाता था। वह आता तो गोपुली आमा की तो मानो आफत आ जाती! कभी किसी के घर से चप्पलें बदल लाता तो कभी कोई और दूसरी आफत पकड़ लाता। खैर इस सबके बीच गोपुली आमा हमेशा मुस्कुराती रहती थी। 

वैसे गोपुली आमा बहुत उम्र की तो न थी मगर बुढ़ापा शुरु हो चुका था। एक बार अचानक बीमार हुई। गांव वालों ने काफी तीमारदारी की। मगर जब दवाओं से भी असर ना हुआ तो बेटे को खबर दी गई। बेटा आया तो अपने साथ शहर लेकर चला गया। पूरे गांव की रोती आंखों ने बगैर मन के गोपुली आमा को गाड़ी में बैठाया। वही हाल उस बेचारी का भी था, वह कहां इस गांव को छोड़ कर जाना चाहती थी। मगर क्या करती जाना मजबूरी थी। 

शहर में बेटे ने डॉक्टरों से इलाज करवाया, दवा-दारु की और सेहत में सुधार होने लगा। पर उसका मन तो गाँव की गलियों में हिलोरे मार रहा था। वो चिल्लपों वाली शहरी जिंदगी उसकी आजाद प्रवृत्ति के लिए एक दमघोंटू कसरत ही थी। इधर गांव में भी गोपुली आमा के बिना बड़ी वीरानी छाई हुई थी। सबको ही ऐसा लगता था मानो कुछ छूट गया हो। गोपुली आमा के इंतजार में कोई अपनी घर की शादी रुकवा कर बैठा हुआ था तो किसी ने पूजा पाठ के कार्यक्रम होल्ड में डाल दिए थे। मथुरा मामा भी अब ना आता था। गांव का हर चेहरा इन दिनों उदास था। हर कोई चाह रहा था कि किसी तरह गोपुली आमा ठीक होकर वापस लौट आए। पूरा गांव उसकी सलामती की मन्नते मांग रहा था।

 कुछ असर दवाओं ने किया और कुछ दुआओं ने। खबर आई कि गोपुली आमा की सेहत सुधरने लगी है। बेटे ने अच्छी दवा-दारू की। डॉक्टरों के इलाज से गोपुली ठीक होने लगी। और जहां कुछ आराम हुआ, उसने बेटे बहू की नाक में दम कर दिया कि उसे वापस गांव पहुंचा दे। डॉक्टरों ने बहुत समझाया कि कुुुुछ दिन रुक जाए।  शरीर में खून की कमी है।  पर  उसने एक न सुनी।  मजबूर बेटा उसे गांव वापस  छोड़ गया।

गोपुली आमा क्या आई गांव की तो मानो लाइफलाइन लौट आई। शादियों के मुहूर्त निकलने लगे। पूजा-पाठ की तिथियां शुरू हो गई। उधर मथुरा मामा भी पहुंच गया। अब तो हर रात गोपुली आमा के घर औरतों की चौपाल रात के दूसरे पहर तक जमी रहती थी। गांव में फिर से वही रंगत और रौनक हो गई। यूं कहो कि गांव की रुकी हुई सांसे चल पड़ी। 

पर डॉक्टरों ने जो परहेज बताए थे वो वह शादी बारात और अनुष्ठानों के पकवानों की भेंट चढ़ गए। गोपुली आमा अचानक कुछ बीमार पड़ी। हाल-चाल पूछने पर पता चला कि पेट में कुछ तकलीफ है। जब दवाओं का असर नहीं हुआ तो गांव वालों ने बेटे को खबर कर दी। झुंझला कर बेटा-बहू फिर आए और कोसते हुए वापस शहर लिवा ले गए। गांव वाले यही मान रहे थे कि पिछली बार की तरह इस बार फिर फ़िर गोपुली आमा ठीक होकर लौट आएगी।

 हफ्ते भर बाद शहर से महादेव बूबू के नाम से एक टेलीग्राम आया। महादेव जोशी, गोपुली आमा के देवर थे। पढ़े-लिखे नहीं थे, तो उन्होंने कुलोमनी हवलदार साहब को बुलाया। हवलदार साहब ने तार पड़ा तो उनकी आंखें नम हो गई। गोपुली आमा का देहांत हो चुका था। कोई अगले 10 मिनट के अंदर पूरा गांव आंगन में इकट्ठा हो गया। कोई रो रहा था, कोई चिल्ला रहा था,  सब पागल हुए जाते थे। 

पूरे गांव की  धड़कन थम चुकी थी। लोग महीनों तक दहाड़ मार-मार कर रोते रहे। महीनों क्या आज कोई 15-20 साल गुजर जाने को है, आज भी जब बात निकलती है तो दिल गमगीन हो जाता है और आंखें भर आती हैं। सच यह है कि वह गोपुली आमा की मौत के साथ ग्वीनाड़ा की लाइफ लाइन चली गई। और इस बात का यकीन होता है कि एक भले इंसान की अहमियत कितनी ज्यादा हो सकती  है।

तेरी जिंदादिली और खुशमिजाजी को मेरा सलाम, गोपुली आमा तुझे प्रणाम।