Saturday, 30 November 2019

महादेव बाबा का स्वाभिमान


महादेव बाबा कभी स्कूल नहीं गए। कभी टूथपेस्ट से दांत साफ नहीं किए और ना कभी कोई दातुन की। एक पुराना कोट पहनते थे जिसे कि साल दो साल में एक बार धो लेते होंगे। मगर नहाते रोज थे और धोती पहनते थे टांगों के बीच से लपेटा लगाकर। वो काले रंग की गांधी टोपी और वह हर रोज मोटा और भारी होता जा रहा वो काले रंग का कोट, उनकी कुछ खास पहचान थे। गांव के बच्चे और बड़े सभी उन्हें प्यार से महादेव बूबू कहा करते थे।

काले पत्थरों की ढालदार छत पर बैठकर कभी गेहूं सुखाते तो कभी चावल। उसी छत पर बैठकर सर्दियों के लिए पुरानी फटी हुई धोती, पैंट, कमीज को सील सील कर रजाई गद्दे बनाया करते थे। वहीं आंगन में बच्चे लोग क्रिकेट खेलते थे। अगर बच्चों की बॉल उनकी छत पर चली गई तो समझ लो कि वहीं उन पर भूमिया अवतार हो जाता था। फिर तो खूब गाली गलौज करते थे।

हमारे गांव की इकलौती दुकान के दुकानदार हुआ करते थे वो! यह दुकान कोई शोरूम या गोदाम नहीं था बल्कि एक आठ खानों वाली लकड़ी की एक अलमारी थी, जिसके अंदर टॉफी, बिस्किट, नमकीन, चाय पत्ती, चीनी, बीड़ी सिगरेट, तंबाकू, साबुन, तेल, नमक जैसी रोजमर्रा की जरूरत का सामान मिल जाया करता। दुकान सुबह नौ बजे से पहले, दोपहर लंच टाइम पर और फिर इसके बाद सीधे शाम को खुलती थी जब वह खेतों से घर पर लौट आते थे।

महादेव जोशी नाम था उनका। वैसे तो धर्म कर्म वाले आदमी थे, गांव के गणमान्य डंगरिया भी थे। किसी को भी डर लगे, छल लगे या भूत वूत लग जाए तो झाड़-फूंक करने और भभुति लगाने में एक्सपर्ट थे। लेकिन होली दिवाली पर कच्ची पक्की जो मिल जाए चढ़ा लिया  करते थे। ज्यादा राग द्वेष, लड़ाई- झगड़ा किसी से ना था। सीधे सिंपल आदमी, न उधो का लेना न माधो का देना।

पर शरीफ आदमियों की चलने कहां दी है किसी ने! स्कूल तो कभी गए नहीं थे, जोड़ घटाने में कुछ खास तेज भी नहीं थे। बस शौक था एक दुकानदार कहलाने का तो दुकान खोल रखी थी। गांव के कुछ धूर्तों ने उनसे सामान लेकर उन्हें पैसे नहीं चुकाए और उधार करते रहे। ज्यादा बड़ा जोड़ महादेव बूबू कर नहीं पाते थे। बेचारे ठगे गए। शहर के बड़े लाला का पैसा नहीं चुका पाए। जब पैसा नहीं चुका पाए तो आगे सामान मिलना बंद हो गया और फाइनली उनकी दुकान ठप हो गई। नुकसान तो गांव वालों का भी हुआ मगर महादेव बूबू का तो रोजगार ही चला गया!

गांव से शहर की दूरी ग्यारह किलोमीटर थी, उसमें भी दो ढाई किलोमीटर का खड़ा पैदल रास्ता। अब लोगों को छोटे से छोटा सामान लेने के लिए शहर जाना पड़ता, जहां दुकानदार उनसे मन मांगे पैसे ऐंठ लिया करते थे। सबको महादेव बूबू की दुकान याद आने लगी थी। अब गांव वालों को महसूस हो रहा था कि उनकी उस दुकान की क्या वैल्यू थी। छोटे बच्चे लोग भी वहां से खूब बलून, पतंग, बिस्किट और टॉफिया खरीदा करते थे। दुकान के बहाने शाम को गांव के लोगों की एक चौपाल ही हो जाया करती थी, मगर जब से दुकान बंद हो गई तो उठना बैठना भी बंद हो गया। अब सब सुनसान था।

उधर महादेव बूबू यह सोच कर परेशान थे कि लाला का कर्ज कैसे चुकाया जाए। लाला कर्जा वापस मांगने के लिए सर पर चढ़ने लगा तो महादेव बूबू को काफी चिंता होने लगी। उम्र 70 के पार हो चुकी थी। बूढ़ी हड्डियों में इतनी ताकत भी नहीं थी कि  कहीं मजदूरी करके चार पैसे कमा लें। हार कर उन्होंने अपने बेटे छोरीलाल से कहा कि वह स्कूल छोड़ कर काम करने शहर चला जाए और कुछ पैसे कमा ले। छोरी लाल को बीच में ही स्कूल छोड़ना पड़ा और वह दिल्ली चला गया। वहां उसे होटल में वेटर की नौकरी मिल गई। कोई साल भर नौकरी करने के बाद वह बड़ी मुश्किल से लाला के पैसे चुका पाया। 

इस पूरे साल महादेव बूबू ने केवल एक टाइम खाना खाया। उन्होंने प्रण कर रखा था कि जब तक लाला का कर्ज न चुका देंगे तब तक एक वक्त भोजन करेंगे वहां  बाल नहीं काटेंगे। लाला का कर्जा चुकाने के बाद उन्होंने घाट में रामगंगा नदी में स्नान किया और मुंडन  करवाया। इसके बाद रामेश्वर में शिवजी को जल चढ़ाया। गांवके  मंदिर जाकर सभी देवी देवताओं को गंगाजल से अभिषेक कराया। उसके बाद बोलेंगी  कि अब चैन से मर सकूंगा, गंगा स्नान के चौथे दिन उनकी इहलोक लीला समाप्त हो गई। यह होती है ईमानदारी और स्वाभिमान की आग जो इंसान को मरने भी नहीं देती!



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