Saturday, 30 November 2019

'विमलापन': एक आजन्म अभिशाप


नारायण दत्त रिटायर्ड फौजी थे। घर में एक बूढ़ी मां, तीन बेटियां और एक बेटा था। इसके अलावा छोटे भाई के परिवार का भी ख्याल रखना ही पड़ता था। बड़ा परिवार था इसलिए रिटायर होने के बाद ट्रक चलाने लगे। पत्नी खेती का कार्यभार संभाले हुए थे। खेती-बाड़ी  पशुपालन  और उनकी नौकरी के बल पर घर ठीक-ठाक चल रहा था।

उनकी बड़ी बेटी का नाम था विमला। बहुत लाड़ था उनको उससे। बचपन से ही उन्होंने बड़े नाज से पाला था उसे। सभी बच्चों में विशेष लगाव था उन्हें विमला से। वक्त की गति को कौन  जानता है! सभी बेटियों की तरह विमला भी विवाह के योग्य हो गई। वर की खोज होने लगी। कन्या रूपमती तो थी ही, कामकाज में कुशल होने के कारण किसी को कोई विशेष चिंता ना थी।

एक दिन पंडितजी जी दूर गांव से एक रिश्ता लेकर पहुंचे। नारायण तो अभी उसे बच्ची ही समझते थे मगर पत्नी जिद करते हुए कहने लगी "इसके पीछे और भी दो बेटियां ब्याहनी हैं। इसलिए समय से शादी कर देना ठीक है। यूं भी तो लड़कियों का विवाह समय पर हो जाना ही बिरादरी में ठीक माना जाता है। कल को कोई ऐसी वैसी बात हो जाए तो मुंह दिखाना मुश्किल हो जायेगा।"

पत्नी की जिद के आगे भला पति की भला कब चली है। होते-होते लड़के वाले ही आ पहुंचे देखने के लिए। नापसंद करने जैसा कुछ भी ना था। शादी का दिन भी तय हो गया। शादी की तैयारियां होने लगी। मंगल गीत गाए जाने लगे। घर में पुताई होने लगी। सजावट के ठान बान किए जाने लगे। फाइनली फागुन मास की चौदस को बारात द्वारे पर आ गई।

शिवप्रसाद एक युवा और आकर्षक व्यक्तित्व वाला हट्टा-कट्टा नौजवान था। हाथ में कुल्हाड़ी दे दी जाए तो एक चोट में देवदार के तने के दो टुकड़े कर दे। दूल्हे का सेहरा पहने तो वह और ही लाजवाब दिखता था। पारंपरिक पहाड़ी रीति रीति-रिवाज के साथ विवाह संस्कार संपन्न हुआ और विमला चल पड़ी अपनी ससुराल की ओर। नारायण दत्त ने भीगी पलकों के साथ बेटी की डोली को कंधा दिया और बारात विदा हुई।

नए घर में सास बहू की शुरुआती तकरार के बाद कुछ ही दिनों में विमला सबकी लाडली हो गई। जेठानिया और सास-ससुर सब उसके गुण गाते न थकते थे। इसी बीच नारायण दत्त को उनके समधी की चिट्ठी मिली है कि गोद भराई के लिए चले आएं। नारायण दत्त की खुशी का ठिकाना ना रहा। फलों की टोकरी, मिठाइयां और तरह-तरह के शगुन लेकर वो बेटी की ससुराल जा पहुंचे।

विमला ने जुड़वा बेटों को जन्म दिया। सास-ससुर की तो मानो बांछें खिल गई। सपनों की सेज सजाई जाने लगी।  कई-कई लंगोटे  सिलवाई गई।  मिठाईयां मंगाई गई।  ससुर जी ने पालने भी दो-दो मंगवा लिए। घर में किलकारियां आ गई। अभी कोई पाँच दिन ना हुए होंगे कि अचानक दोनों बच्चों की तबीयत बिगड़ी और बारह घंटे के अंतर पर एक के बाद एक दोनों काल के गाल में समा गए। घर की खुशियां मातम में बदल गईं। विमला की झोली आंसुओं से भर गई।

मातम में कौन कितना साथ देता है। हर किसी को  काम चाहिए था। विमला ने भी कमर कसी और दोनो पति-पत्नी निकल पड़े खेतों में पसीना बहाने। कुछ ही दिनों में जिंदगी फिर से पुरानी जैसी हो गई। इसी बीच  खेतों में काम करते हुए एक दिन शिवप्रसाद की छाती में तेज दर्द हुआ, खांसी आई और खून की एकाध उल्टी हुई। अस्पताल पहुंचाया तो उन्होंने भर्ती कर लिया। डॉक्टरों ने कहा कि हालत गंभीर है कुछ जांच करवानी होंगी।

जांच की रिपोर्ट अपने साथ नाउम्मीदगी लेकर आई। डॉक्टर से पता चला डॉक्टर से पता चला कि शिवप्रसाद चंद घंटों का मेहमान था। विमला के दामन में दुख और दर्द का पहाड़ टूट पड़ा। भर्ती होने के तीसरे रोज शिव प्रसाद ने अस्पताल में ही तोड़ दिया। विमला का सिंदूर वैधव्य की भेंट चढ़ गया। हाय री  कुदरत तेरा इंसाफ! पहले मां से उसके बच्चे छीन लिए और उसके बाद एक सुहागन से उसका सौभाग्य!

महज उन्नीस बरस की विधवा बेटी जब गांव लौटी तो नारायण दत्त फूट फूट कर रो पड़े। वह इस कदर टूट गए कि उन्होंने गाड़ी चलानी छोड़ दी और घर पर ही रहने लगे। उनकी तबीयत भी अब कुछ ठीक नहीं रहा करती। दुख की वेदना इंसान की रातों की नींद उड़ा देती है। एक दुखियारा बाप भाग्य को कोसने के सिवा कर भी क्या सकता था?

 जब वह लंबे समय तक काम पर वापस नहीं लौटे तो उनका एक पुराना साथी ड्राइवर छत्र सिंह उनसे मिलने गांव ही पहुंच गया।  उसने पूछा "नारायण दा तू क्यों परेशान है?" परेशानी जानने पर उसने कहा "अगर तू बुरा ना माने तो मैं लड़का बताता हूं। लड़का रोजगार वाला है मगर उसके मां-बाप नहीं हैं। बिटिया को संभाल लेगा। तेरी बेटी की अभी उम्र ही क्या है? तू इसकी दूसरी शादी कर दे। फिर से इसका घर बस जाएगा और तेरा दुख दूर हो जाएगा।" 

नारायण दत्त की आंखों में खुशी की चमक आ गई। उन्होंने अपनी पत्नी को खेतों से वापस बुलाया और खुशी-खुशी छतर सिंह का प्रस्ताव सुना डाला। पत्नी आग बबूला हो गई बोली ब्राह्मणों में औरतों का दूसरा विवाह उसकी मृत्यु से भी बुरा माना जाता है। दोबारा इस तरह की बात मत करना। हमारे धर्म में औरतें पति के साथ सती होती हैं और तुम हो कि अपनी बेटी का दूसरा विवाह कराने पर तुले हुए हो। समाज में मुंह दिखाने लायक छोड़ोगे कि नहीं" 

दूसरे कमरे में बैठी  विमला यह सबकुछ सुन रही थी। कुछ देर उम्मीदों के उथले समंदर में गोते लगाने के बाद अब वह वापस सामने टंगी हुई अपनी फटी हुई सफेद चुनरी को एकटक देख रही थी। वह अब अपनी रंगहीन नियति को बखूबी जान चुकी थी।




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