इस वक्त मैं असम के जोरहाट नामक स्थान पर एक सरकारी कैंप के भीतर मौजूद हूं. यह जगह उत्तर भारत से काफी जु़दा है, चाहे भाषा बोली के मामले में हो, जलवायु के मामले में हो या फिर खानपान के मामले में ही क्यों ना हो. वहां ग्वालियर में जब चालीस रुपए किलो टमाटर था, तो हम मोल भाव करके उसे तीस में लाने की कोशिश करते थे और यहां आकर टमाटर का भाव पूछा तो साठ रुपए किलो था. दूध का स्वाद ऐसा था जैसे पाउडर घोलकर पानी में मिला दिया गया हो. गुवाहाटी से जोरहाट तक मैं ट्रेन से आया मगर पूरे रास्ते में कहीं एक अदद भैंस तक नहीं दिखाई दी.
सब्जियां बेहिसाब महंगी हैं. यहां तक कि आटा भी कोई चालीस पचास रुपये किलो मिल रहा है. एक दुकानदार ने बताया कि यहां कोई रोटी नहीं खाता इसलिए यहां गेहूं नहीं मिलता और आटा भी बेहद महंगे दामों पर मिलता है. उत्सुकता वश मैं भी पूछ बैठा कि भाई यहां यह तो बताओ यहां मिलता क्या है तो वह बोला कि यहां सस्ता और बढ़िया अगर कुछ मिलता है तो वह है मछली!
मछली का नाम सुनते ही मेरे दिमाग में पानी की छवि तैरने लगी. बाथरूम में आने वाले पानी का रंग लाल हरा पीला मिलाके थोड़ा सा जंग के रंग का है. स्वाद बड़ा अजीब सा है. पहले तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि यह वाकई पानी है. जो लोग ग्वालियर और दिल्ली के पानी को खारा कहते हैं वह इस पानी को शायद पानी मानने से ही इंकार कर दें कर दें! दीवारों में हर जगह सीलन है, कई जगह तो काई जमी हुई है और यह केवल घरों के बाहर ही नहीं बल्कि भीतर की दीवारों में भी जमी हुई है. सुना है कि यह सांपो की बड़ी पसंदीदा जगह है, चलते-फिरते कभी दरवाजों से तो कभी छत से यहां सांप कुछ उस तरह गिरते रहते हैं जैसे चौमांस के महीने में पीपल का फल!
मिट्टी कहीं दूर दूर तक नहीं दिखाई देती. या तो बड़ी-बड़ी घास उगी हुई है या फिर पेड़ों के समूह अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं. कहीं-कहीं केरल की तरह नारियल के भी पेड़ हैं. सोचता हूं कि चलो कम से कम नारियल पानी तो सस्ता होगा. दरअसल मैं थोड़ा कंजूस किसिम का आदमी हूं इसलिए किसी जगह का आकलन सबसे पहले मैं उसके बाजार भाव से ही करता हूं. इसके बाद से दूसरी चीजों को देखता हूं.
दुकानों में पुरुष हो चाहे स्त्रियां बोलते बिल्कुल एक ही सा हैं: करती है खाती है पीती है आती है जाती है यही बोलते हैं. भाषा में लिंग के अंतर के लिए यहां कोई जगह नहीं है. भाषा की क्लिष्टता को यहां के लोगों ने कुछ हद तक काफी कम कर दिया है. हिंदी लोग समझ भी लेते हैं और बोल भी लेते हैं, वह बात अलग है कि जी उसके आभूषणों को उतार देते हैं। यानी कि हमको भी समझा भी देते ही हैं. भाषा का यही उद्देश्य है कि आप खुद समझ लें और सामने वाले को समझा लें, बाकी सुंदरता और शुद्धता के दावे तो भाषा के कथित ठेकेदारों के बीच वाद-विवाद की चीजें होती हैं. आम जन का इससे कोई लेना-देना नहीं होता.
जो भी हो यहां के प्राकृतिक सौंदर्य मैं तो बिल्कुल भी कमी नहीं है चारों ओर सुंदरता भरी पड़ी है. बारिश बेइंतहा होती है और रुक भी जाए तो ऐसा लगता है कि जैसे अभी हो ही रही हो, शायद पूर्वोत्तर की तस्वीर में चेरापूंजी और मानसून की बंगाल की खाड़ी वाली शाखा से होने वाली ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन वर्षा जेहन में स्थाई रुप से अंकित हो चुकी है. पिछले तीन चार दिनों से बारिश हो रही थी जो कि कल ही बंद हुई है मगर तारीफ करनी होगी यहां के ड्रेनेज सिस्टम की, कि कहीं पर दो लोटा पानी भी इकट्ठा हुआ नजर नहीं आता, वरना अपने यहां तो घंटे भर की बारिश में शहर के सारे छोटे-बड़े गड्ढे भर जाते हैं बल्कि कभी-कभी तो सड़कों को देखकर लिए लगने लगता है कि शायद या बाढ़ ही आ गई हो! जबकि हकीकत यह होती है कि महज घंटा दो घंटा बारिश, मुश्किल से हुई होती है. ड्रेनेज सिस्टम के मामले में यहां से काफी कुछ सीखा जा सकता है. मैस में जाने पर एक नई चीज देखने को मिली कि टेबल पर हरी मिर्च जरुरी तौर पर परोसी जाती है. खाने में लहसुन खूब डाला जाता है और अक्सर देखता हूं कि वह कच्चा ही रहता है और उसकी महक पूरे खाने को गुलजार करती है कह लीजिए या फिर बर्बाद करती है, मैं नहीं बता पाऊंगा. यहां तक कि समोसे, परांठे और आलू की सब्जी वगैरा में भी कच्चा लहसुन अलग से महक रहा होता है.
आप भी कभी असम आइये और इस सबका मजा लीजिए। काजीरंगा के हाथी, कामाख्या मंदिर पर लगी भीड़ देखने जरूर जाइएगा और यहां का मशहूर तांबूल और यहां की लाल चाय जरूर टेस्ट कीजिएगा।
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